Asaram Banane ki Kahani बडी आजीब है, उनकी जीवन-लीला, बचपन, जंगल यात्रा, उद्देश्य व विदेश यात्रा आदि तथा आसुमल से आसाराम कैसे यह भी जानेगें ।
Asaram Banane ki Kahani | Story of Becoming Asaram
संत आसारामजी का बचपन :
संत आसारामजी का जन्म 1 मई 1937 को अखण्ड भारत के सिंध प्रांत के नवाबशाह जिले में सिंधु नदी के तट पर बेराणी गाँव में हुआ । इनके बचपन का नाम आसुमल था । पिता थाऊमल नगरसेठ थे व माँ महँगीबा बड़ी ही सुशील व पतिपरायण थीं । आसुमल का बचपन बड़ा दिव्य रहा। परिवार में इनके एक बड़े भाई, दो बड़ी बहन व एक छोटी बहन हैं ।
सन् 1947 में भारत-पाक विभाजन के समय अहमदाबाद के मणिनगर में यह परिवार आ बसा । इनकी शिक्षा तीसरी कक्षा तक हुई । दस वर्ष की आयु में पिता का स्वर्गवास हो गया । बड़े होने पर इनके न चाहते हुए भी माता के दबाव में आकर शादी हुई लेकिन पत्नी लक्ष्मीदेवी को संयमी जीवन जीने का आदेश देकर उन्होंने ईश्वरप्राप्ति के लिए घर छोड़ दिया।
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आसुमल 23 फरवरी 1964 को घर छोड़ आत्मसाक्षात्कार के लिए उत्तराखण्ड की गिरि-गुफाओं में विचरण करने लगे । दृढ़निश्चयी आसुमल के हृदय में था :
‘हे ईश्वर ! तेरे स्वरूप का मुझे ज्ञान मिले ।’
आसुमल कंटकाकीर्ण मार्ग पर चले, शिलाओं पर सोये, मौत का मुकाबला करते-करते नैनीताल के बीहड़ जंगल में जा पहुँचे । वहाँ बनी कुटिया में साँईं लीलाशाहजी के दर्शन हुए । जिन्होंने आसुमल को शिष्य रूप में स्वीकारा । गुरुद्वार पर कठोर कसौटियाँ हुईं। कुछ दिनों बाद 7 अक्टूबर 1964 को वज्रेश्वरी (मुंबई) में सद्गुरुकृपा से आसुमल को आत्मसाक्षात्कार हुआ ।
सद्गुरु साँईं लीलाशाहजी ने आसुमल का नया नाम आसाराम रखा । आत्मसाक्षात्कार के बाद आसारामजी 7 वर्ष तक डीसा (गुज.) व माउंट आबू की नल गुफा में रहे । वहाँ उन्होनें ध्यानयोग, ज्ञानयोग, लययोग, कुंडलिनी योग आदि की सिद्धियाँ प्राप्त कीं । योग सम्पन्न साँईं लीलाशाहजी ने आशीर्वाद दिया ‘आसाराम ! तू गुलाब होकर महक तुझे जमाना जाने ।’
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सद्गुरु से आज्ञा व आशीर्वाद मिलने के बाद संत आसारामजी ने देश-विदेश में घूम-घूमकर सत्संग-सेवा करना आरम्भ किया । सन् 1972 में अहमदाबाद में एक कुटिया बनायी, जो आज एक विशाल आश्रम के रूप में परिणत है, जिसकी शाखाएँ देश-विदेश में फैली हुई हैं । बापू के पास करीब 2000 आश्रमवासी रहते हैं, जो स्वेच्छा से आजीवन समर्पित हैं और बिना किसी वेतन के निःस्वार्थ सेवा करते हैं ।
संत आसारामजी को हिन्दी, गुजराती, सिन्धी, पंजाबी, मराठी, भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी आदि कई भाषाओं का ज्ञान है । जीवन के लिए इनका सूत्र है ‘स्वस्थ्य जीवन, सुखी जीवन व सम्मानित जीवन।’ धर्म के बारे में वे कहते हैं :
‘‘सारे धर्म उस परमात्मा की सत्ता से उत्पन्न हुए हैं और सारे के सारे उसी एक परमात्मा में समा जायेंगे। लेकिन जो सृष्टि के आरम्भ में भी था, अभी भी है और सृष्टि के अंत में भी रहेगा, वही तुम्हारा आत्मा ही सच्चा धर्म है । उसे ही जान लो, बस ! तुम्हारी सारी साधना, पूजा, इबादत और प्रार्थना सफल हो जायेगी ।’’
अवश्य पढें- संत आसारामजी के चमत्कार
संत आसारामजी ने विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार बड़े जोर-शोर से किया । सन् 1984 में – शिकागो, सेन्ट लुईस, लास एंजिल्स, सैन्फ्रान्सिस्को, कनाडा, टोरेन्टो आदि ।
सन् 1986 में – पूर्वी अफ्रीका, लंदन, अमेरिका, कनाडा आदि ।
सन् 1987 में – इंग्लैण्ड, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, अमेरिका व कनाडा ।
सन् 1991 में – दुबई, हाँगकाँग, सिंगापुर आदि ।
सन् 1993 में – हाँगकाँग, ताईवान, बैंकाक, सिंगापुर, इंडोनेशिया, न्यूजर्सी, न्यूयार्क, बोस्टन, आल्बनी, क्लिफ्टन, जोलियट, लिटलफोक्स ।
सन् 1993 के शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म संसद’ के 600 वक्ताओं में भारत से आये हुए संत आसारामजी का बहुत बोलबाला रहा । इनको तीन दिन घंटों-घंटों तक बोलने का समय दिया गया । लग रहा था कि मानों सन् 1893 का दूसरा विवेकानंद प्रकट हो गया हो ।
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