Anu Aur Bhu-Chumbakattva | अणु और भू-चुम्बकत्व

Written by Rajesh Sharma

📅 April 29, 2022

Anu Aur Bhu-Chumbakattva | अणु और भू-चुम्बकत्व

Anu (अणु) की परिभाषा क्या है, इसकी खोज किसने की तथा Bhu-Chumbakattva | भूचुम्बकत्व (Geomagnetism) को सबसे पहले किसने परिभाषित किया । यहाँ पर Anu Aur Bhu-Chumbakattva को समझाया गया है ।

अणु । Molecule

Anu Aur Bhu-Chumbakattva | अणु और भू-चुम्बकत्वअणु के सूक्ष्मतम स्वरूप

उसकी विशेषताओं एवं

उसकी शक्ति आदि से

भारतीय ऋषि-मुनि

सैकड़ों वर्ष पहले परिचित थे ।

कणाद ऋषि ने अपने ग्रंथ ‘वैशेषिक दर्शन’ में इस Anu स्पष्ट व्याख्या की है ।

प्रसिद्ध विज्ञान लेखक डॉ. ब्रजेंन्द्रनाथ शील ने ‘पाजिटिव साइड ऑफ इंडियन साइंस’ में अणु के प्राचीन भारतीय सिद्धांत की विषद् वैज्ञानिक विवेचना की है ।

अनेक देशी-विेदेशी विचारकों की मान्यता है कि प्राचीन भारत में  अणु विस्फोट की तकनीक थी । महाभारत के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि अणुबम जैसे महाविनाशकारी हथियार भी उस समय भी थे, पर इनका दूरुपयोग न हो सके, इस हेतु सभी वरिष्ठजन सामूहिक प्रयास भी करते थे । प्राचीन ग्रंथों में ये बातें रोचक कथानकों के माध्यम से वर्णित हैं ।

Anu Aur Bhu-Chumbakattva | अणु और भू-चुम्बकत्व को समझने के बाद निम्न विषय को भी अवश्य जाने ।

इसे भी पढेंः-

गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत | सौरमण्डल

CLICK HERE-   Gurutvakarshan Siddhant । गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत | सौरमण्डल

भू-चुम्बकत्व । Geomagnetism

यदि कोई चुंबक धागे से स्वतंत्र रूप से लटकाई जाए तो वह सदैव उत्तर व दक्षिण दिशा में ही ठहरती है । माना जाता है कि इसका कारण सर्वप्रथम विलियम गिलबर्ट ने 1600 ई. में बताया था कि यह पृथ्वी में विद्यमान चुंबकत्व के कारण होता है ।

Anu Aur Bhu-Chumbakattva | अणु और भू-चुम्बकत्वअस्य वै (भू:) लोकस्य रुपम् । अयस्मय्य: सूच्य ।

                                 – तैतिरीय ब्राह्मण, 3, 9, 6, 5

ते (असुरा) वा अयस्मवीम् एवमां पृथिवीम् अकुर्वन् ।

                                     – ऐतरेय ब्राह्मण 1, 23

यह तथ्य भारतीय ऋषियों ने पहले ही बतला दिया था कि पृथ्वी में चुंबक बल है ।

ऋग्वेद 7-15-14 में पृथ्वी को ‘आयसी’ (लोहयुक्ताम्) कहा गया है ।

गैलेक्सी’ के विषय में प्राचीन भारत में चुंबकीय क्षेत्र जैसे सिद्धांत की समुचित रुप से व्याख्या कर दी गई थी । इस प्रकार गैलेक्सी के विषय में प्राचीन भारत में जो सिद्धांत मिलते हैं उनकी पुष्टि आधुनिक काल में ह्वेल के स्थिरांक से हुई है ।

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