गौरक्षा : में ही जीवन

जन्मदात्री माँ तो मात्र शिशु-अवस्था में ही पयपान कराती है परंतु गौमाता तो आजीवन हमें अपने दूध-दही-मक्खन आदि से पोषित करती है । उसका उपकार किस प्रकार चुकाया जा सकता है ? अपने इन सुंदर उपहारों से वह जीवन भर हमारा हित करती है । फिर भी गौमाता की उपयोगिता से अनभिज्ञ होकर सरकार की गलत नीतियों के कारण तथा मात्र उसके पालन-पोषण का खर्च वहन न कर पाने के बहाने उन्हें कत्लखानों के हवाले करना विकास का कौन-सा मापदंड है ? क्या गौमाता के प्रति हमारा कोई कर्तव्य नहीं है ?

गाय धरती का वरदान, जिसकी महिमा महान

* गौमाता के दर्शन एवं गाय के खुरों की धूलि मस्तक पर लगाने से भाग्य की रेखाएँ बदल जाती हैं, घर में सुख-समृद्धि एवं शांति बनी रहती है।
* जहाँ पर गौएँ रहती हैं उस स्थान को तीर्थभूमि कहा गया है, ऐसी भूमि में जिस मनुष्य की मृत्यु होती है उसकी तत्काल सद्गति हो जाती है, यह निश्चित है । – (ब्रह्मवैवर्तपुराण,श्रीकृष्णजन्म खंड : 21.91-93)
* गो-ग्रास देने तथा गाय की परिक्रमा करने से मनोकामना सिद्ध होती है, धन-संपदा स्थिर रहती है तथा अभीष्ट की प्राप्ति होती है।
* गाय को प्रेम से सहलाने से ग्रहबाधा, पीड़ा, कष्ट आदि दूर होते हैं।
* गौ के शरीर के रोम-रोम से गूगल जैसी पवित्र सुगंध आती है। उसके शरीर से अनेक
प्रकार की वायु निकलती है जो वातावरण को जंतुरहित करके पवित्र बनाती है ।

।। गौ-संस्कृति ।।

खेती, गौपालन, बागवानी और इन तीनों से जुड़े हुए उद्योगों (कामकाज) पर टिकी हुई एक जीवन शैली है । गौ-संस्कृति यानी बहुआयामी कृषि प्रणाली पर टिकी हुई जीवन व्यवस्था ।
* गौ-संस्कृति आधुनिक विज्ञान की अत्याधुनिक स्थापनाओं और शोधो के आधारभूत तथ्यों पर टिकी हुई है।
*. यह जीवन शैली प्राकृतिक पर्यावरण की विशुद्धता के साथ कम-से- कम छेड़छाड़ करते हुए यानी प्रकृति में जितने भी प्राणी-पशु, पक्षी, जल, जीव, जीवाणु आदि है उसके साथ अपना तालमेल बैठाकर जीवन जीने का तरीका है।
* गोबर रेडियोधर्मिता सोखता है एवं ईंधन, खाद की भी आपूर्ति करता है।
* गोसेवा केन्द्रित जीवन-पद्धति, गौशाला केन्द्रित ग्रामोद्योग और गोचर केन्द्रित कृषि से स्थायी, समग्र व संतुलित विकास संभव है।
* आधा टन वजन की गाय रात-दिन में 12 सौ वाट की गर्मी देती है। गोवंश लगभग 30 हजार मेगावाट जितनी ऊर्जा देता है। गायों के लिए गौशालाएँ आश्रय स्थल हैं, जो ऊर्जा केन्द्र बन सकती हैं।
* गोधन से विकसित धान्य और धन मानवता को हृदयहीन व जड़ होने से बचाता है।
* आधुनिक सभ्यता प्राकृतिक सम्पदा का अंधाधुंध दोहन कर रही है। पिछले 50-60 वर्षों से सारी दुनिया का पर्यावरण बुरी तरह प्रदूषित हुआ है। संसार के सभी प्रबुद्ध वैज्ञानिक इस स्थिति से चिंतित हैं।

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