Kashmir Atank Aur Film | कश्मीर आतंक और फिल्म | Kashmir Terror and Film

Written by Rajesh Sharma

📅 March 19, 2022

यदि कहानी पाश्विक और क्रूर है उसे वैसा ही दिखाए जाने में गलत क्या है । Kashmir Atank Aur Film लेख में नरसंहार कहाँ कब और कैसे तथा किसके द्वारा किया गया । इसके पीछे कौन- कौन सी शक्तियाँ काम कर रही थी आदि यहाँ देखें ।

Kashmir Atank Aur Film

कश्मीर आतंक और फिल्म | Kashmir Terror and Film

‘द ताशकंद फाइल्स’ जैसी चर्चित फिल्म बनाने वाले निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री की नई फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ जबरदस्त हिट होे रही है । इस फिल्म को लेकर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। राजनीति के घमासान ने फिल्म को और भी चर्चित कर दिया है। ऐसा नहीं है कि कश्मीर को केन्द्र में रख पहले फिल्में नहीं बनीं। पहले फिल्मकारों ने कश्मीर की हसीन वादियों में केवल रोमांस ही दिखाई दिया। फिर आतंकवाद से ग्रस्त कश्मीर को आधार बनाकर कई फिल्में बनीं।

कई हिट फिल्मों में आतंकवाद से ग्रस्त कश्मीर को दिखाया गया परन्तु आज तक किसी ने भी कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनकी पीड़ा को फोक्स में रखकर कोई फिल्म नहीं बनाई। आज तक किसी नामी-गिरामी फिल्म निर्माता-निर्दशक ने इस विषय को छुआ ही नहीं। कश्मीर की खूबसूरत वादियों में घाटी के काले इतिहास को बेहद मार्मिक और दर्दनाक ढंग से दिखाया जाना ही इस फिल्म को दूसरी फिल्मों से अलग दिखाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह फिल्म तथ्यों पर आधारित है।

कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार नाजियों और सिखों पर हुए अत्याचारों से कम नहीं हैं। निर्देशक ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ में कथानक को तोड़मरोड़ कर ड्रामाई अंदाज में पेश करने की जरा भी कोशिश नहीं की। यदि कहानी पाश्विक और क्रूर है तो फिर उसे वैसा ही दिखाए जाने में गलत क्या है ।

Realated Artical

द कश्मीर फाइल फिल्म

द आसाराम फाइल फिल्म

Kashmir Atank Aur Film

द कश्मीर- इतिहास, आतंक व नरसंहार

Kasmir File कश्मीर को लेकर भारत और पाकिसतान में विवाद की शुरुआत विभाजन के समय से ही प्रारंभ हो गई थी। 26 अक्टूबर को 1947 को जम्मू और कश्मीर (लद्दाख सहित) के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए विलय-पत्र पर दस्तखत किए थे । गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को इसे मंजूरी दी । 22 अक्टूबर 1947 को कबाइली लुटेरों के भेष में पाकिस्तानी सेना को कश्मीर में भेज दिया । वर्तमान के पाक अधिकृत कश्मीर में खून की नदियां बहा दी गईं ।

पाकिस्तानी सेना, पुलिस और कबायलियों द्वारा मीरपुर, मुजफ्फराबाद, भिंबर, कोटली और देव बटाला जैसे शहरों पर पाकिस्तान के कब्जे के कारण 50 हजार नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी और लाखों लोग विस्थापित होकर शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं । पिछले 75 वर्षों में जहां  गैरमुस्लिम और शियाओं को मार-मारकर भगा दिया गया ।

पंहित नेहरू की गलती :

भारत की सेना के साथ पाकिस्तान की सेना और कबाइलियों का युद्ध हुआ लेकिन 31 दिसंबर 1947 को नेहरूजी ने यूएनओ से अपील की कि वह युद्ध विराम चाहता है जिसके चलते सेना कश्मीर में आगे नहीं बढ़ पाई और कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय रेखा के साथ ही नियंत्रण रेखा भी निर्मित हो गई। 1

जनवरी 1949 को भारत-पाकिस्तान के मध्य युद्ध-विराम की घोषणा कराई गई थी लेकिन पाकिस्तान ने तब तक लद्दाख के गिलगित बाल्टिस्तान सहित जम्मू और कश्मीर के आधे हिस्से पर कब्जा कर लिया था। बाद में उक्त क्षेत्र में से जम्मू कश्मीर के क्षेत्र को पाकिस्तान ने एक आजाद देश घोषित कर दिया और गिलगित बाल्टिस्तान वाले क्षेत्र को अपने हिस्से में लेने के लिए छोड़ दिया जिसे पाकिस्तान का नॉर्दन एरिया कहा गया ।

कश्मीर को लेकरकश्मीर को लेकर भारत पाक युद्ध :

इसके बाद पाकिस्तान ने अपने सैन्य बल से 1965 में कश्मीर पर कब्जा करने का प्रयास किया जिसके चलते उसे मुंह की खानी पड़ी। इसका परिणाम यह हुआ कि 1971 में उसने फिर से कश्मीर को कब्जाने का प्रयास किया। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसका डटकर मुकाबला किया और अंतत: पाकिस्तान की सेना के 1 लाख सैनिकों ने भारत की सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और बांग्लादेश  नामक एक स्वतंत्र देश का जन्म हुआ । इंदिरा गांधी यदि वे चाहतीं तो यहां कश्मीर की समस्या हमेशा-हमेशा के लिए सुलझ जाती, लेकिन वे जुल्फिकार अली भुट्टो के बहकावे में आ गईं और 1 लाख सैनिकों को छोड़ दिया गया ।

Kasmir Fileइस युद्ध के बाद पाकिस्तान को समझ में आ गई कि कश्मीर हथियाने के लिए आमने-सामने की लड़ाई में भारत को हरा पाना मुश्किल ही होगा। 1971 में शर्मनाक हार के बाद काबुल स्थित पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी में सैनिकों को इस हार का बदला लेने की शपथ दिलाई गई और अगले युद्ध की तैयारी को अंजाम दिया जाने लगा लेकिन अमेरिका और सोवियत संघ के शीतयुद्ध के कारण अफगानिस्तान में हालात बिगड़ने लगे और पाकिस्तान वहां उलझ गया ।

1971 से 1988 तक पाकिस्तान की सेना और कट्टरपंथी अफगानिस्तान में उलझे रहे। यहां पाकिस्तान की सेना ने खुद को गुरिल्ला युद्ध में मजबूत बनाया और युद्ध के विकल्पों के रूप में नए-नए तरीके सीखे। यही तरीके अब भारत पर आजमाए जाने लगे। सबसे पहले उनसे एक ओर पंजाब के सिखों को खालिस्तान का समय दिखाया और दूसरी ओर उसने कश्मीर के लिए छद्म युद्ध की तैयारी कर ली ।

The Kasmir File Filmऑपरेशन टोपाक :

जुल्फिकार अली भुट्टों की मौत के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जिया-उल-हक ने 1988 में भारत के ऑपरेशन टोपाक नाम से वॉर विद लो इंटेंसिटी की योजना बनाई । इस योजना के तहत भारतीय कश्मीर के लोगों के मन में अलगाववाद और भारत के प्रति नफरत के बीज बोने थे और फिर उन्हीं के हाथों में हथियार थमाने थे । साथ ही वहां से गैर मुस्लिमों को पलायन के लिए मजबूर करना भी शामिल था ।

भारतीय राजनेताओं के इस ढुलमुल रवैये के चलते कश्मीर में ऑपरेशन टोपाक बगैर किसी परेशानी के चलता रहा । ऑपरेशन टोपाक  पहले से दूसरे और दूसरे से तीसरे चरण में पहुंच गया। अब उनका इरादा सिर्फ कश्मीर को ही अशांत रखना नहीं रहा, वे जम्मू और लद्दाख में भी सक्रिय होने लगे । पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने मिलकर कश्मीर में दंगे कराए और उसके बाद आतंकवाद का सिलसिला चल पड़ा । पहले चरण में मस्जिदों की तादाद बढ़ाना, दूसरे में कश्मीर से गैरमुस्लिमों और शियाओं को भगाना और तीसरे चरण में बगावत के लिए जनता को तैयार करना।

अब इसका चौथा और अंतिम चरण चल रहा है। अब सरेआम पाकिस्तानी झंडे लहराए जाते हैं और सरेआम भारत की खिलाफत की जाती है, क्योंकि कश्मीर घाटी में अब गैरमुस्लिम नहीं बचे और न ही शियाओं का कोई वजूद है । यह तथ्य दुनिया से छुपा नहीं है कि पाकिस्नान ने पाक अधिकृत कश्मीर को भारतीय कश्मीर में आतंकवादी फैलाने के लिए एक ट्रेनिंग सेंटर बना दिया है। 1988 से ही पाकिस्तान आतंकवादियों को यहां ट्रेंड कर जम्मू और कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए भेजता है ।

बेनजीर भुट्टो ने भड़काई अलगाववाद की आग  पाक अधिकृत कश्मीर के नरसंहार के बाद भारत अधिकृत कश्मीर में रह रहे पंडितों के लिए कश्मीर में छद्म युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के काल में हुई । उसने षड़यंत्र पूर्वक कश्मीर में अलगाव और आतंक की आग फैलाई । उसके भड़काऊ भाषण की टेप को अलगाववादियों ने कश्मीर में बांटा। बेनजीर के जहरिले भाषण ने कश्मीर में हिन्दू और मुसलमानों की एकता तोड़ दी। अलगाववाद की चिंगारी भड़का दी और फिर एक सुबह पंडितों के लिए काल बनकर आई ।

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इस्लाम के विरुद्ध आवाज

इस्लाम क्या है ?

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नरसंहार की शुरुआत :

The Kasmir File Film19 जनवरी 1990 को कश्मीर के हर पंडितों और हिन्दुओं के घरों पर रातोरात एक पर्चा चिपका दिया गया कि कश्मीर छोड़कर चले जाओ वर्ना मौत के घाट उतार दिए जाओगे। 19 जनवरी 1990 को सुबह कश्मीर के प्रत्येक हिन्दू घर पर एक नोट चिपका हुआ मिला, जिस पर लिखा था कश्मीर छोड़ के नहीं गए तो मारे जाओगे ।

इस नोट के साथ ही मस्जिदों से ऐलान किया गया कि पंडितों कश्मीर छोड़ो। सभी ओर अफरा तफरी मच गई और पूरे कश्मीर में कत्लेआम का दौरा शुरु हो गया। सिर्फ भारत ही नहीं पाक अधिकृत कश्मीर में भी यह दौर शुरु हो गया। पनुन कश्मीर सहित 1989 से 1995 के बीच कत्लेआम का एक ऐसा दौर चला की पंडितों को कश्मीर से पलायन होने पर मजबूर होना पड़ा।

पन्नुन कश्मीर, कश्मीर का वह हिस्सा है, जहां घनीभूत रूप से  कश्मीरी पंडित रहते थे। विस्थापित कश्मीरी पंडितों का एक संगठन है पनुन कश्मीर इसकी स्थापना सन् 1990 के दिसम्बर माह में की गई थी। इस संगठन की मांग है कि कश्मीर के हिन्दुओं के लिए कश्मीर घाटी में अलग राज्य का निर्माण किया जाए ।

कश्मीर में आतंकवाद के चलते करीब 7 लाख से अधिक कश्मीरी पंडित विस्थापित हो गए और वे जम्मू सहित देश के अन्य हिस्सों में जाकर रहने लगे । इस दौरान हजारों कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतार दिया गया ।

Kashmir Atank Aur Film

नरसंहार व मंदिरो का नाश :

इस नरसंहार में 6000 कश्मीरी पंडितों को मारा गया। 750000 पंडितों को पलायन के लिए मजबूर किया गया । 1500 मंदिरों नष्ट कर दिए गए। 600 कश्मीरी पंडितों के गांवों को इस्लामी नाम दिया गया। केंद्र की एक रिपोर्ट के अनुसार कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों के अब केवल 808 परिवार रह रहे हैं तथा उनके 59442 पंजीकृत प्रवासी परिवार घाटी के बाहर रह रहे हैं । कश्मीरी पंड़ितों के घाटी से पलायन से पहले वहां उनके 430 मंदिर थे। अब इनमें से मात्र 260 सुरक्षित बचे हैं जिनमें से 170 मंदिर क्षतिग्रस्त है ।

The Kasmir File Filmपाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवादियों द्वारा छेड़े गए छद्म युद्ध के द्वारा आज कश्मीरी पंडित अपनी पवित्र भूमि से बेदखल हो गए हैं और अब अपने ही देश में शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं। पिछले 32 वर्षों से जारी आतंकवाद ने घाटी के मूल निवासी कहे जाने वाले लाखों कश्मीरी पंडितों को निर्वासित जीवन व्यतीत करने पर मजबूर कर दिया है। ऐसा नहीं है कि पाक अधिकृत कश्मीर और भारतीय कश्मीर से सिर्फ हिंदुओं को ही बेदखल किया गया। शिया मुसलमानों और सिखों का भी बेरहमी से नरसंहार किया गया ।

पहले अलगाववादी संगठन ने कश्मीरी पंडितों से केंद्र सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के लिए कहा था, लेकिन जब पंडितों ने ऐसा करने से इनकार दिया तो हजारों कश्मीरी मुसलमानों ने पंडितों के घर को जलाना शुरू कर दिया। महिलाओं का बलात्कार कर उनको छोड़ दिया। बच्चों को सड़क पर लाकर उनका कत्ल कर दिया गया और यह सभी हुआ योजनाबद्ध तरीके से।

इसके लिए पहले से ही योजना बना रखी थी। सबसे पहले हिन्दू नेता एवं उच्च अधिकारी मारे गए। फिर हिन्दुओं की स्त्रियों को उनके परिवार के सामने सामूहिक बलात्कार कर जिंदा जला दिया गया या नग्नावस्था में पेड़ से टांग दिया गया। बालकों को पीट-पीट कर मार डाला। यह मंजर देखकर कश्मीर से तत्काल ही 3.5 लाख हिंदू पलायन कर जम्मू और दिल्ली पहुंच गए। यह सारा तमाशा पूरा देश मूक दर्शक बनकर देखता रहा ।

आतंक का ट्रेनिंग स्थल :

जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में एक बार उमर अब्दुल्ला ने ताजा जानकारी दी थी कि पाक अधिकृत कश्मीर में अब भी करीब 4,000 कश्मीरी ट्रेनिंग ले रहे हैं। उन्होंने विधायक प्रोफेसर चमनलाल गुप्ता के प्रश्न के लिखित जवाब में विधानसभा में कहा था कि पीओके और पाकिस्तान में कथित रूप से अब भी करीब 3,974 आतंकवादी घुसपैठ की तैयारी कर रहे हैं ।

Kashmir Atank Aur Film

पुनर्वास की सचाईः 

सच्चाई यह है कि कोई भी संगठन, राज्य और केंद्र सरकार कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास में खास रुचि नहीं रखती। कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी के लिए विभिन्न केंद्रीय व राज्य सरकारें लगातार प्रयास करने का दावा करते हुए कई पैकेजों की घोषणा कर चुकी हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात है ।

संबंधित लेखः https://bit.ly/3wkxRug

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