संस्कृति रक्षक संघ

आध्यात्मिक भारत निर्माण

संस्कृति रक्षक संघ’ एक स्वतंत्र व निष्पक्ष संगठन है, जो कि भारतीय संस्कृति की रक्षा व प्रचार के लिए संकल्पबद्ध है । यह संगठन भारतीय संस्कृति के जीवनमूल्यों को एवं लुप्त हो रहीं पावन परम्पराओं को पुनर्स्थापित करने का कार्य करता है तथा यह युवाओं में संस्कृतिप्रेम जगाने के कार्य को प्राथमिकता देता है ।

यह संगठन सभी संस्कृतिप्रेमी संगठनों व राष्ट्रप्रेमियों के साथ मिलकर चलने के लिए कटिबद्ध है । यह ऐसे सभी प्रयासों को तत्परता से करता है, जिनसे देशवासी अपने शास्त्रों, संतों, महापुरुषों एवं ऋषियों के बताये हुए मार्ग का तन-मन-धन से अनुसरण करते हुए उन्नत व सुसम्पन्न बनें ।

‘संस्कृति रक्षक संघ’ सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार में लगे हुए सभी संगठनों का मित्र संगठन है, यहाँ तक कि विश्व कल्याण में संलग्न सभी देशों का भी सहयोगी है ।

प्रमुख सेवाकार्य

· भारतीय सनातन संस्कृति के उच्च आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाना ।
· जगह-जगह पर चिकित्सालय, गौशाला, अन्नपूर्णा मंदिर (भोजनशालाएँ) इत्यादि के माध्यम से लोगों की सेवा करना ।
· योग एवं आयुर्वेद पद्धति से उपचार का प्रचार करना ।
· गरीब, पिछड़े क्षेत्रों में सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक उत्थान के लिए कार्य करना ।
· वैदिक प्रदर्शनी के माध्यम से लोगों में सनातन संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना ।
· छुआछूत, भेदभाव को मिटाकर सामाजिक समरसता का निर्माण करना ।
· लुप्त हो रही गुरुकुल परम्परा को पुनः स्थापित करना ।
· समाजोपयोगी सरकारी योजनाओं की जानकारी जन-जन तक पहुँचाना तथा ‘संस्कृति रक्षक संघ’ एन.जी.ओ. के माध्यम से लोगों को सरकार द्वारा प्रदत्त योजनाओं का लाभ दिलाना ।
· समाज में बढ़ रहे व्यसन, कुरीतियों, असामाजिक प्रवृत्तियों के प्रति लोगों को सावधान करना तथा भारतीय संस्कृति के प्रतीक मठ, मंदिर, आश्रम, तीर्थ, साधु, संत, गाय एवं पवित्र नदियों इत्यादि के रक्षण हेतु अभियान चलाना ।

इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्कृति रक्षक संघ की पाँच शाखाएँ बनायी गयी हैं ।

1. आस्था केन्द्र
2. विद्यार्थी उत्कर्ष केन्द्र
3. आरोग्य शिविर
4. संस्कृति बचाओ अभियान
5. सहायता-सेवा केन्द्र

1) आस्था केन्द्र

आस्था केन्द्र का लाभ कोई भी उठा सकता है व समाज की सेवा करके इस जनहित के कार्य में सहभागी बन सकता है । हर उम्र के व्यक्ति इसके सदस्य बन सकते हैं ।

अन्य धार्मिक संस्थाओं द्वारा चलाये जा रहे संगठनों को उनके कार्यक्रमों के लिए स्थान एवं अन्य जरूरी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है व उन्हें ‘आस्था केन्द्र’ में प्रवेश दिया जाता है ।

आस्था केन्द्र का निर्माण :

जिस गाँव या शहर में ‘आस्था केन्द्र’ बनाना हो, वहाँ पर जमीन की व्यवस्था करके सबसे पहले उस पर पीपल, बड़, आँवला, नीम, तुलसी, आम इत्यादि जीवन-हितकारी वृक्ष लगाये जाते हैं ।
वास्तुशास्त्र के अनुसार उचित भूमिखण्ड पर भगवान की मूर्ति की स्थापना की जाती है व वटवृक्ष के पास शिवलिंग की स्थापना होती है । एक योग-प्रशिक्षण संस्कार केन्द्र व व्यायामशाला का निर्माण भी किया जाता है ।
यदि कहीं पर पहले से ही मंदिर बना हो तथा पास में खुली जमीन हो तो वहाँ पर भी ‘आस्था केन्द्र’ बनाया जा सकता है ।

कार्यप्रणाली :

आस्था केन्द्र की शुरुआत कैसे करें : आस्थापीठ : सर्वप्रथम पूर्व या उत्तर दिशा में आस्थापीठ (वेदी) की स्थापना की जाती है । 1 मीटर त्रिज्यावाले अर्ध चंद्राकार वृत्त में आस्थापीठ का निर्माण किया जाता है, जिसकी ऊँचाई 5 से.मी. से लेकर 1 मीटर तक हो सकती है । आस्थापीठ को गौ के गोबर से लीपन कर शुद्ध किया जाता है तथा अबीर, गुलाल, इत्यादि से उसके ऊपर चारों ओर रंगोली बनायी जाती है ।

आस्थापीठ के बीच में छोटा-सा श्वेत कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर चावल से स्वस्तिक बनाया जाता है । उसके मध्य में जल से भरा हुआ कलश रखा जाता है । कलश में आम के पत्ते एवं नारियल रखा जाता है । कलश के पीछे ॐकार का बड़ा चित्र लगाया जाता है तथा आस्थापीठ के ईशान कोण में दीप प्रज्वलित किया जाता है ।

रक्षकगण आस्थापीठ से लगभग 3 मीटर की दूरी पर उचित आसन (कम्बल, चटाई इत्यादि) पर इसकी ओर मुख करके बैठते हैं ।
आस्था केन्द्र के प्रशिक्षक आस्थापीठ के पास खड़े होकर शंखनाद करते हैं । इसके बाद सामूहिक शांतिपाठ, प्रार्थना इत्यादि आस्था केन्द्र के कार्यक्रम शुरू किये जाते हैं ।

आस्था केन्द्र का 1 घंटे का कार्यक्रम : आस्था केन्द्र के 1 घंटे के कार्यक्रम द्वारा रक्षकगणों में परस्पर आत्मीयता, एकजुट होकर कार्य करने की वृत्ति, अनुशासन तथा राष्ट्रहित के कार्य करने का उत्साह एवं दायित्व निभाने की भावना विकसित होती है । आस्था केन्द्र-कार्यक्रम के 1-1 मिनट की उपयोगिता के लिए 60 मिनट का पूर्व निर्धारित आयोजन :

शांतिपाठ व प्रार्थना 5 मिनट
दौड़ 2 मिनट
सूर्यनमस्कार 3 मिनट
शारीरिक विकास कार्यक्रम 10 मिनट
खेलकूद 20 मिनट
गुंजन व मंत्रोच्चारण 5 मिनट
बौद्धिक विकास कार्यक्रम 10 मिनट
आरती 5 मिनट

 

शांतिपाठ :

दो-तीन मिनट ॐकार का गुंजन किया जाता है । उसके बाद शांतिपाठ किया जाता है ।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।।

अर्थात् जो बहुत सुननेवाला है, परम ऐश्वर्यवान है, वह ईश्वर हमारे लिए उत्तम सुख को दे । जो समस्त वेदों का ज्ञाता है और जिसके ज्ञान से वह सभीको पुष्ट करता है, वह हमें भी उस सुख को प्रदान करे । जो अश्व के समान गतिशील है और उसीकी भाँति हमें भी सुख देनेवाला है, जो बृहस्पति आदि अर्थात् ज्ञान का स्वामी है, सभीका पालनहार है, वह परमेश्वर स्वयं भी उत्तम सुखों को धारण करनेवाला है अर्थात् आनंदस्वरूप है, वह हमें भी सुख प्रदान करे । (यजुर्वेद : 25.19)

द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष ्ँ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्ति सर्व ्ँ शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ।।

सभी प्रकाश देनेवाले पदार्थ, दोनों लोकों के बीच का आकाश, पृथ्वी, जल, प्राण, सोमलता, औषधियाँ, विद्वान लोग, उपद्रव-विनाशक ईश्वर, वेद तथा सम्पूर्ण वस्तुएँ शांति और सुख देनेवाली हों तथा दूसरों को भी शांति और सुख देनेवाली हों । (यजुर्वेद : 36.17)

प्रार्थना

वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जावें ।
पर सेवा कर, पर उपकार में हम, निज जीवन सफल बना जावें ।
हम दीन दुःखी निर्बल-विकलों के, सेवक बन संताप हरें ।
जो हैं अटके, भूले-भटके, उनको तारें खुद तर जावें ।
छल दंभ द्वेष, पाखण्ड झूठ, अन्याय से निशदिन दूर रहें ।
जीवन हो शुद्ध सरल अपना, शुचि प्रेम-सुधा रस बरसावें ।
निज आन मान मर्यादा का, प्रभु ध्यान रहे, अभिमान रहे ।
जिस देश में हमने जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जावें ।

शारीरिक-मानसिक विकास कार्यक्रम :

(क) दौड़ लगाना : शारीरिक, मानसिक तथा फेफड़ों की शक्ति बढ़ानेवाला यह अभ्यास बहुत ही लाभदायक है । दौड़ लगानेवाले हिरण आदि प्राणी अन्य प्राणियों की तुलना में कितने स्वस्थ और फुर्तीले रहते हैं, सभी जानते हैं । कई प्रकार से दौड़ का अभ्यास किया जाता है, जैसे – 1. साधारण दौड़ 2. एक पैर की लँगड़ी दौड़ 3. मेढक दौड़ 4. हनुमान दौड़ 5. एड़ी दौड़ । (विस्तृत जानकारी के लिए ‘संस्कृति रक्षक संघ’ का अन्य साहित्य देखें ।)

(ख) सूक्ष्म व्यायाम : दोनों हाथों को ऊपर करके पंजों के बल कूदना, एक ही स्थान पर खड़े-खड़े दौड़ने की क्रिया करते हुए पैरों से जल्दी-जल्दी नितम्ब पर प्रहार करना, रस्सी की सहायता से कूदना इत्यादि प्रकार से फेफड़ों व संधिस्थानों की कसरत की जाती है, जिससे प्राणशक्ति बढ़े व शरीर में रक्तसंचार सुव्यवस्थित हो जाय ।
विविध व्यायाम : तितली व्यायाम, नौका संचालन, चक्की चालन, पूर्ण चंद्र नमस्कार, हाथों व पैरों का व्यायाम इत्यादि समयानुसार किये जाते हैं ।

(ग) सूर्यनमस्कार : हमारे ऋषियों द्वारा खोजी गयी यह ऐसी अद्भुत यौगिक कुंजी है, जिसमें विभिन्न महत्त्वपूर्ण योगासनों एवं व्यायाम-प्रकारों के साथ-साथ मंत्र-विज्ञान, यौगिक चक्रों के ध्यान एवं श्वास-गति संचालन का भी सुमेल किया गया है । यह हमारे शरीर को आरोग्य तथा ऊर्जा प्रदान करता है और शरीर के समस्त अंग-प्रत्यंगों को सशक्त व क्रियाशील बनाता है । सूर्यनमस्कार प्रतिदिन अनिवार्यरूप से करने के लिए रक्षकगणों को प्रेरित करना चाहिए । इससे न केवल स्नायु पुष्ट होते हैं बल्कि हृदय, जठर, फेफड़े, आँतें इत्यादि क्रियाशील एवं मजबूत बनते हैं । सूर्यनमस्कार के 13 मंत्र व 10 स्थितियाँ होती हैं । इसकी प्रत्येक स्थिति को ठीक से समझें । किस स्थिति में किस केन्द्र पर ध्यान करना है तथा श्वास-प्रश्वास किस प्रकार करना है, इसका भी ध्यान रखें ।
मंत्र : ॐ मित्राय नमः, ॐ रवये नमः, ॐ सूर्याय नमः, ॐ भानवे नमः, ॐ खगाय नमः, ॐ पूष्णे नमः, ॐ हिरण्यगर्भाय नमः, ॐ मरीचये नमः, ॐ आदित्याय नमः, ॐ सवित्रे नमः, ॐ अर्काय नमः, ॐ भास्कराय नमः, ॐ श्रीसवितृसूर्यनारायणाय नमः ।

(घ) आसन : प्राचीन ऋषि-मुनियों द्वारा खोजे गये आसन शारीरिक- मानसिक-बौद्धिक विकास करने के साथ व्यक्ति को रोगमुक्त कर दीर्घजीवी बनाते हैं । आसन खाली पेट तथा धरती पर विद्युत-कुचालक कम्बल आदि बिछाकर उस पर किये जाते हैं । सिद्धासन, सर्वाूंगासन, हलासन, पादपश्चिमोत्तानासन, शशकासन, चक्रासन इत्यादि का अभ्यास विशेषरूप से किया जाता है ।

(च) मुद्राएँ : ज्ञान मुद्रा, शून्य मुद्रा, पृथ्वी मुद्रा, लिंग मुद्रा, सूर्य मुद्रा इत्यादि मुद्राओं का नित्य अभ्यास किया जाता है ।

(छ) खेलकूद : जीवन को रसपूर्ण एवं आनंदमय बनाने में खेलों का महत्त्वपूर्ण योगदान है । खेलकूद से न केवल हमारा मनोरंजन होता है बल्कि मानसिक थकान दूर होकर हमारा शारीरिक व बौद्धिक विकास भी होता है । आस्था केन्द्र में कई तरह के खेल खेले जाते हैं । जैसे –
1) दौड़भागवाले खेल : स्पर्श खेल, रेलगाड़ी खेल, लँगड़ों की बारात, कबड्डी इत्यादि ।
2) कूदनेवाले खेल : जोकर कूद, दंड परिक्रमा, चोर-सिपाही, खो-खो, कुर्सी दौड़, चक्रव्यूह इत्यादि ।
3) बैठनेवाले खेल : अंत्याक्षरी, महापुरुषों की खोज, रस्साकशी
इत्यादि । (खेलों की विस्तृत जानकारी के लिए हमारा अन्य साहित्य देखें ।)

बैठक सभा

(1) गुंजन व मंत्र-उच्चारण : ‘ॐ’ का सामूहिक गुंजन व ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’, ‘हरि ॐ’, ‘ॐ नमः शिवाय’ इनमें से किसी एक मंत्र का दीर्घ स्वर से उच्चारण किया जाता है ।

(2) बौद्धिक विकास कार्यक्रम : बौद्धिक विकास कार्यक्रम का आस्था केन्द्र में बहुत महत्त्व है क्योंकि इससे विचारों की स्पष्टता बढ़ती है तथा भ्रांत विचार व मान्यताएँ दूर होती हैं और उचित ढंग से सोचने की शैली का विकास होता है । इससे ‘प्रत्युत्पन्न मति’ (कॉमन सेन्स) प्राप्त होने से व्यक्ति कैसी भी परिस्थिति में उसका यथायोग्य हल शीघ्र ही निकालने में सक्षम हो जाता है । व्यक्ति की बुद्धि पर छाया हुआ आवरण हटकर वह अपने देश, धर्म, संस्कृति एवं परम्पराओं की महानता के प्रति जागृत होकर उनके प्रति अपना दायित्व निभाता है । उसे अपने जीवन की सही दिशा प्राप्त होने से वह मानव-जीवन की बुलंदियों को छू लेता है ।

भक्तिगीत : इससे भक्तिभाव एवं देशप्रेम जागृत होता है । इसके शब्द हृदय में स्पंदन एवं संवेदना उत्पन्न कर देते हैं ।

चंदन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है ।
हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा बच्चा राम है ।
हर शरीर मंदिर-सा पावन, हर मानव उपकारी है,
जहाँ सिंह बन गये खिलौने, गाय जहाँ माँ प्यारी है ।
जहाँ सवेरा शंख बजाता, लोरी गाती शाम है ।।1।।
जहाँ कर्म से भाग्य बदलते, श्रम निष्ठा कल्याणी है,
त्याग और तप की गाथाएँ, गाती कवि की वाणी है ।
ज्ञान जहाँ का गंगा जल-सा, निर्मल है अविराम है ।।2।।
इसके सैनिक समर भूमि में, गाया करते गीता हैं,
जहाँ खेत में हल के नीचे, खेला करती सीता है ।
जीवन का आदर्श जहाँ पर, परमेश्वर का धाम है ।।3।।
चंदन है इस देश की माटी….

राष्ट्रगीत

वन्दे मातरम् । वन्दे मातरम् ।
सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम् । शस्य श्यामलां मातरम् ।।
वन्दे मातरम् । वन्दे मातरम् ।
शुभ्र ज्योत्सना पुलकित यामिनीम् ।
फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम् । सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम् ।
सुखदां वरदां मातरम् ।।
वन्दे मातरम् । वन्दे मातरम् ।

सुभाषित वचन :- इनमें थोड़े शब्दों में ज्यादा कहने की क्षमता होती है । ये सूत्र एवं मंत्रस्वरूप होने से सहजता से याद हो जाते हैं । इनका उपयोग करने से विषय-वस्तु की स्पष्टता एवं महत्ता बढ़ती है । इनमें अपौरुषेय वेदों तथा ऋषि-मुनियों व महानुभावों के अनुभव का निचोड़ होता है, जो अपने जीवन में दिग्दर्शन का कार्य करता है । इतिहास साक्षी है कि इनमें से किसी एक सूत्र के हृदय में चोट कर जाने पर कइयों को महापुरुषत्व की प्राप्ति हुई है ।

· उग्रं वचः अपावधीः । अर्थात् कठोर भाषण मत करो । (सामवेद : 353)
· मर्तो न वष्ट तद्वचः । बुरे वचन न सुनें । (सामवेद : 774)
· सुगा ऋतस्य पंथाः । सत्य का मार्ग सुलभ है । (ऋग्वेद : 8.31.13)
· उत्तिष्ठत प्र तरता सखायः । हे मित्रो ! कटिबद्ध हो जाओ, पुरुषार्थी बनो; संसाररूपी सागर से पार हो जाओ, दुःखों को लाँघ जाओ । (यजुर्वेद : 35.10)
· उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । उठो, जागो और महापुरुषों के पास जाकर आत्मज्ञान प्राप्त करो । (कठोपनिषद् : 3.14)
· येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।।
जिन मनुष्यों में न तो विद्या ही है, न तप, दान, ज्ञान, शील, गुण एवं धर्म ही है, वे इस भूलोक में पृथ्वी के भारस्वरूप पशु ही हैं जो मनुष्य के रूप में विचरते रहते हैं । (नीतिशतकम् : 13)

अंत्याक्षरी : एक पक्ष द्वारा बताये गये शब्द या काव्य के अंतिम अक्षर से शुरू होनेवाला दूसरा शब्द या काव्य सामनेवाले पक्ष द्वारा बताया जाय, इसे अंत्याक्षरी कहते हैं । इस प्रतियोगिता के लिए रक्षकगण के दो विभाग बना लिये जाते हैं । शब्द-अंत्याक्षरी के अंतर्गत सांस्कृतिक प्रतीकों, ऋषियों, देवी-देवताओं, देवनदियों आदि विभिन्न सांस्कृतिक शब्दों पर प्रतियोगिता होती है । काव्य-अंत्याक्षरी में रामचरितमानस, मीराबाई आदि के भजन, देशभक्ति के गीत, सात्त्विक कविताएँ आदि का समावेश किया जा सकता है । फिल्मी गीत आदि पूर्णतः वर्जित हैं । इसके लिए एक व्यक्ति को निर्णायक के रूप में नियुक्त किया जाता है ।

बोधकथा : अपने शास्त्रों एवं पुराणों में वर्णित कथा-वार्ताएँ, महापुरुषों के जीवन के प्रेरक-प्रसंग तथा वर्तमान जगत में घटित ऐसी ताजा घटनाएँ, जो हमें व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन में किस प्रकार आचार-विचार-व्यवहार रखना चाहिए, इसकी उत्तम सीख देती हैं उन्हें ‘बोधकथा’ कहा जाता है । बोधकथाएँ सत्प्रेरणा का भंडार होती हैं, जो हमारा मनोरंजन तो करती ही हैं, साथ ही हमारे जीवन में महान आदर्शों को सहज में ही उतार देती हैं । वीरों-क्रांतिकारियों के जीवन-प्रसंग, भक्तगाथाएँ पढ़ने-सुनने एवं सुनाने से जीवन वीरता, भक्तिभाव इत्यादि सद्गुणों से ओतप्रोत हो जाता है ।

आरती : ॐ जय जगदीश हरे…
ॐ जय जगदीश हरे, प्रभु ! जय जगदीश हरे ।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे ।। प्रभु0 ।।
जो ध्यावै फल पावै, दुख विनसै मन का ।
सुख-सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तन का ।। प्रभु0 ।।
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी ।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी ।। प्रभु0 ।।
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ।। प्रभु0 ।।
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता ।
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता ।। प्रभु0 ।।
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति ।
किस बिधि मिलूँ दयामय ! मैं तुमको कुमति ।। प्रभु0 ।।
दीनबंधु दुखहर्ता तुम ठाकुर मेरे ।
अपने हाथ उठाओ द्वार पड़ा तेरे ।। प्रभु0 ।।
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा ।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा ।। प्रभु0 ।।
ॐ जय शिव ओंकारा…
जय शिव ओंकारा, भज शिव ओंकारा ।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ।। ॐ हर हर महादेव ।।

आरती के बाद :

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ।।
मंगलं भगवान विष्णुः मंगलं गरुडध्वजः ।
मंगलं पुण्डरीकाक्षः सर्व मंगलाय तनो हरिः ।।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ।।

अर्थ : सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सभी सबका मंगल देखें और किसीको भी किसी दुःख की प्राप्ति न हो ।
आरती के बाद प्रसाद-वितरण किया जाता है ।

2) विद्यार्थी उत्कर्ष केन्द्र

हर रविवार को निर्धारित समय पर ‘संस्कृति रक्षक संघ’ द्वारा नियुक्त आचार्य के द्वारा ‘विद्यार्थी उत्कर्ष केन्द्र’ चलाया जाता है, जिसमें इन विषयों पर मार्गदर्शन दिया जाता है :

1. स्मृतिशक्ति की वृद्धि हेतु (15 मिनट) :

वैदिक मंत्र ‘ॐ’ का गुंजन, बुद्धिशक्ति व मेधाशक्तिवर्धक प्रयोग, भ्रामरी प्राणायाम, सारस्वत्य मंत्रजप तथा आहार-विहार एवं अपनी जीवनशैली के द्वारा स्मृतिशक्ति कैसे बढ़ायी जा सकती है, इस पर मार्गदर्शन दिया जाता है ।

2. नूतन विषयों पर मार्गदर्शन (45 मिनट) :

निष्णात शिक्षकों द्वारा नीचे दिये गये विषयों पर आधारित पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है । हर सप्ताह किसी एक या दो विषयों का अध्ययन होता है ।

क) वैदिक शास्त्र-अध्ययन

वैदिक विज्ञान

चार वेद, इनके उपवेद एवं छः वेदांगों में वर्णित सूक्ष्म विज्ञान को सिखाया जाता है, जो आज के वैज्ञानिकों के लिए भी आश्चर्य का विषय बन रहा है ।

पाठ्यक्रम
खण्ड (अ), अध्याय-1

प्रकृति के अजूबे जिन्हें विज्ञान नकारता है, प्रत्यक्ष के गर्भ में छिपी रहस्यमयी दुनिया, अविज्ञात के गर्भ में गूँजती हैं ध्वनियाँ, मधुवर्षा किसने की, प्रकृति से मानव सीखे तकनीकी ज्ञान, अचानक लुप्त होनेवालीं वस्तुएँ, पृथ्वीवासी विलुप्त क्यों होते हैं, शांत रातों को बरसते हैं वहाँ पत्थर, अनीति का प्रतिकार, पहाड़ से सोना बरसता है और सोने से शैतान ।

अध्याय-2

हम ब्रह्माण्ड में अकेले हैं क्या ?, वैज्ञानिक मान्यताएँ या तीर-तुक्का, ब्रह्माण्ड में विद्यमान विकसित सभ्यताएँ, अन्य लोकवासियों का पृथ्वी से सम्पर्क, लोक-लोकांतर का पारस्परिक आदान-प्रदान, अद्भुत इमारतें और रहस्यमयी सुरंग, दूसरे लोकों से भी लोग आते हैं, अंतरिक्ष से आये अपरिचित अतिथि, देवताओं और मनुष्यों के मध्य आदान-प्रदान की कथा ।

अध्याय-3

ज्योतिर्विज्ञान और वेदशालाएँ, ज्योतिष विज्ञान उपेक्षणीय नहीं है, ज्योतिर्विद्या की समूचित जानकारी जन-जन तक पहुँचे, अंतर्ग्रही प्रभावों से आत्मरक्षा कैसे करें, गणितीय नियमों में बँधे हम सब, समूचा ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर, आरोग्यशास्त्र का पूरक ज्योतिर्विज्ञान, ज्योतिर्विज्ञान को नूतन का चोला पहनाया जाय ।

अध्याय-4

यथार्थ तो स्वीकारना ही पड़ेगा, विज्ञान और अध्यात्म परस्पर पूरक बनें, आस्थाक्षेत्र में भी विज्ञान का प्रवेश, दर्शन और विज्ञान हैं परस्पर पूरक व अभिन्न, विज्ञान और अध्यात्म में विरोध कहाँ, विज्ञान को अध्यात्म के साथ मिलना होगा, धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई, आधुनिक विज्ञान की खोज का आधार वैदिक ग्रंथ ।

खण्ड (ब)

आश्रम-व्यवस्था, वस्त्र-परिधान, आभूषण, अलंकार, क्रीड़ा, विनोद, शयनासन, पात्र, यातायात-साधन, कृषि, औषधि, वनस्पति, पशुपालन, विविध शिल्प, व्यापार उद्योग, अर्थव्यवस्था व मुद्राएँ । शिक्षा व शिक्षा विधि, शिक्षा के विषय, वेदों में समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र व शिक्षाशास्त्र ।

वैदिक दर्शन
पाठ्यक्रम

दर्शन का अर्थ, महत्ता, उपयोगिता, ब्रह्म, ब्रह्म का स्वरूप ईश्वर, जीव, मनोविज्ञान का स्वरूप, अध्यात्म विद्याएँ, प्राण व प्राणायाम, आत्मविद्या, ब्रह्मविद्या, योग-साधना, स्तुति, प्रार्थना, उपासना ।
वेदों का महत्त्व, वेदों में विज्ञान का स्वरूप, वेदों का ज्ञान, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद में धर्मसाधना, मानव-कल्याण की भावना, पवित्र संस्कारों का महत्त्व, संयमित जीवन के महत्त्व का अध्ययन ।

वैदिक गणित

इसमें अथर्ववेद के सोलह सूत्रों द्वारा गणित के कठिन सवालों का कम-से-कम समय में सही जवाब पाने की युक्तियाँ सिखायी जाती हैं ।

पाठ्यक्रम

वैदिक संख्याएँ, वैदिक गणितीय सूत्र, वैदिक जोड़ व घटाना, वैदिक गुणा व भाग, वैदिक रीति से वर्गफल, घनफल निकालना, वैदिक रीति से सहायक भिन्न आवर्ति दशमलव इत्यादि प्राप्त करना, वैदिक सूत्रों का विज्ञान, भूगोल, ज्यामिति इत्यादि क्षेत्रों में उपयोगिता ।

ख) सत्य इतिहास

वर्तमान में छात्रों एवं समाज को सत्य इतिहास से वंचित करके असत्य, मनगढ़ंत कहानियों का प्रचार किया जा रहा है । ‘संस्कृति रक्षक संघ’ द्वारा भारत के वास्तविक इतिहास का प्रचार करके समाज को हकीकत से अवगत कराया जाता है ।

पाठ्यक्रम (अध्याय-1)

इतिहास का आरम्भ, वेद, वैदिक प्रणाली की मूल धाराओं की यथार्थता, वैदिक संस्कृति का विश्व-प्रसाद, विश्व के पंथों में वैदिक उद्गम के प्रमाण, समस्त मानवों के आचार-विचारों की जननी संस्कृत, वेद-विज्ञान और वैदिक शिल्पशास्त्र के ग्रंथ, वैदिक संस्कृति का मूल स्थान, वैदिक विश्व में भारत की ख्याति, वैदिक सेना संगठन, यज्ञ की प्राचीन जागृति प्रथा, अग्नि साक्ष्य शपथ ।

अध्याय-2

वैदिक संस्कृति ही मानवीय व्यवहारों का मूल स्रोत, वैदिक विश्व के भौगोलिक प्रमाण, विश्व भर की वैदिक कालगणना, विश्व की प्राचीन वैदिक विवाह-प्रणाली, वैदिक संगीत का विश्व-प्रसार, वजन और नापों के प्राचीन संस्कृत नाम, विश्वप्रसिद्ध वैदिक विद्याप्रणाली, पश्चिम एशिया का वैदिक अतीत, अरबस्थान का वैदिक अतीत, इसलाम का वैदिक उद्भव ।

अध्याय-3

इतिहास का महत्त्व, इतिहास की अध्ययन-पद्धति, इतिहास संशोधन पद्धति, भारतीय इतिहासकारों के अक्षम्य अपराध, आंग्ल तथा इसलामी पुरातत्त्वी षड्यंत्र, इतिहास के सबक, हिन्दू दस्तावेजों का अभाव, निराधार कल्पनाएँ, इतिहास का दैनंदिन जीवन में उपयोग, इतिहास में परायों का हस्तक्षेप, हिन्दुत्व विरोधी षड्यंत्र, ऐतिहासिक अज्ञान से होनेवाली असीम हानि ।

ग) नैतिक शिक्षा व संस्कृति-जागरण

सांस्कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक ताजा घटनाओं-विषयों पर निष्णात वक्ताओं द्वारा मार्गदर्शन दिया जाता है ।

पाठ्यक्रम

हम आर्य हैं, सभी धर्मों के मूल व पुरातन ग्रंथ वेद हैं, यम-नियम, ॐ की व्याख्या व अर्थ, संध्या, यज्ञ व यम-नियम, सोलह संस्कार, षट्सम्पत्ति, स्वभाषा का प्रयोग करना, स्वदेशी वेशभूषा व खानपान को प्राथमिकता देना, संस्कृति पर हो रहे कुठाराघात से अपने व दूसरों को बचाना तथा जनमानस को सावधान करना ।

3. बाल विकास कार्यक्रम (15 मिनट) :

1) परीक्षा में सफलता हेतु : गणित, विज्ञान, इतिहास आदि स्कूली पाठ्यक्रम के प्रत्येक विषय में अधिक-से-अधिक अंक प्राप्त करने हेतु उसे किस प्रकार पढ़ना चाहिए तथा बोर्ड की परीक्षाओं में प्रश्नों के उत्तर किस प्रकार लिखने की अपेक्षा विद्यार्थियों से की जाती है, इस प्रकार की पढ़ाई में उपयोगी अनेक बातें सिखायी जाती हैं ।

2) संस्कृति, श्रद्धा, आस्था, आत्मविश्वास, नैतिकता, महापुरुषों के जीवन-प्रसंग, माता-पिता-गुरुजनों का आदर-सेवा, ऋषि-विज्ञान, अपना सच्चा इतिहास, सनातन धर्म की वैज्ञानिक मान्यताएँ, पर्व-त्यौहार, स्कूली शिक्षा, आदर्श दिनचर्या इत्यादि में से किसी-न-किसी विषय पर बच्चों में सामूहिक चर्चा व प्रश्नोत्तरी करायी जाती है तथा किसी-किसी सत्र में चर्चा के स्थान पर बच्चे अपने समूह को वक्तव्य देते हैं, जिससे उनकी वक्तृत्वशक्ति का विकास होता है ।

3) शास्त्र-चर्चा, प्रश्नोत्तरी व खेल : कभी गीता, भागवत, रामायण, महाभारत इत्यादि वैदिक संस्कृति के सद्ग्रंथों पर चर्चा व प्रश्नोत्तरी होती है तो कभी बुद्धिशक्तिवर्धक खेल खिलाये जाते हैं । जैसे –
प्रश्न : संस्कारों की संख्या कितनी है ?
उत्तर : सोलह संस्कार ।
प्रश्न : शिवरात्रि की तिथि क्या है ?
उत्तर : फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी ।
प्रश्न : महाभारत का युद्ध किस क्षेत्र में हुआ था ?
उत्तर : कुरुक्षेत्र ।
अंत में यह प्रार्थना करके ‘विद्यार्थी उत्कर्ष केन्द्र’ की समाप्ति होती है :
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ।।
अर्थ : सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सभी सबका मंगल देखें और किसीको भी किसी दुःख की प्राप्ति न हो ।

उत्सव व पर्व

विद्यार्थी उत्कर्ष केन्द्रों, आस्था केन्द्रों एवं विभिन्न स्थानों पर भारतीय संस्कृति के पर्वों-उत्सवों को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है ।
पर्व या उत्सव के दिन लोगों को उसकी महिमा के बारे में बताया जाता है । उसे क्यों और कैसे मनाना चाहिए, उसको मनाने के पीछे क्या वैज्ञानिक रहस्य छुपा है, उसे मनाने से क्या-क्या लाभ होते हैं – यह सब समझाया जाता है । तुलसी, पीपल, गंगा, गाय, गीता, माता-पिता, पितर इत्यादि को भारतीय क्यों मानते-पूजते हैं, इनको मानने के क्या लाभ हैं – ऐसी अनेक बातें बतायी व समझायी जाती हैं । इस दिन सांस्कृतिक नाट्य व गान का भी आयोजन किया जाता है । सत्साहित्य, पोस्टर, महापुरुषों के सत्संग-प्रवचनों की सीडी, प्रदर्शनी इत्यादि के माध्यम से भारतीय संस्कृति की महिमा बतायी जाती है ।

3) आरोग्य शिविर

कहा गया है : ‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है ।’

आस्था केन्द्रों के द्वारा समय-समय पर आरोग्य शिविरों का आयोजन किया जाता है, जिनमें लोगों को स्वस्थ रहने के लिए घरेलू नुस्खे, मंत्र-चिकित्सा, आयुर्वैदिक उपचार आदि बताये व किये जाते हैं । आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है ।

प्रशिक्षित वैद्यों व डॉक्टरों के द्वारा चिकित्सा भी की जाती है । ‘आरोग्य शिविर’ में ‘नशा-उन्मूलन कार्यक्रम’ का भी आयोजन होता है ।

नशा-उन्मूलन कार्यक्रम : नशामुक्त जीवन, सुखमय जीवन ।

इस अभियान के अंतर्गत विशेषज्ञों द्वारा लोगों को नशे से होनेवाली हानियों तथा उससे बचने के उपायों के बारे में बताया जाता है । एक आकर्षक प्रदर्शनी के माध्यम से शराब, बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, गुटखा इत्यादि नशीले पदार्थों से होनेवाले रोगों के बारे में समझाया जाता है तथा उन रोगों का उपचार बताया व किया जाता है ।

नशे से सावधान करनेवाला साहित्य, सीडी, पैम्फलेट, पोस्टर, कैलेण्डर इत्यादि दिये जाते हैं, ताकि इन सभी चीजों का लाभ लेकर व्यक्ति स्वयं नशे से बचे व दूसरों को भी सावधान करे ।

आयुर्वैदिक बीड़ी व मुखवास उपलब्ध कराये जाते हैं तथा इन्हें बनाने की विधि भी बतायी जाती है । इनका उपयोग करने से किसीके लिए भी नशा छोड़ना बिल्कुल आसान हो जाता है और वह आगे भी नशे से बच सकता है । उपचार के लिए गौमूत्र (गौझरण), सौंफ-मिश्री, हरड़, आँवला, तुलसी इत्यादि का उपयोग कैसे किया जाय तथा इनसे असाध्य रोग कैसे ठीक होते हैं, यह भी बताया जाता है ।

अंत में एक संकल्प-सभा का आयोजन किया जाता है, जिसमें संकल्प कराया जाता है कि ‘हम इष्टदेव, भगवान सूर्य व पृथ्वी माता को साक्षी मानकर यह संकल्प लेते हैं कि आज से हम कोई नशा नहीं करेंगे तथा दूसरों को भी नशे से सावधान करेंगे ।’
यह संकल्प तीन बार दोहराया जाता है तथा घर जाकर इस संकल्प को सुबह-शाम दोहराने की सभीसे प्रतिज्ञा करायी जाती है ।

4) संस्कृति बचाओ अभियान

इस अभियान में लोगों को सनातन संस्कृति की महिमा बतायी व समझायी जाती है । सनातन संस्कृति पर हो रहे अत्याचारों के बारे में भी बताया जाता है तथा उन्हें रोकने व उनसे बचने के उपाय भी किये जाते हैं । इस अभियान के अंतर्गत इन कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है :

क) संस्कृति-दर्शन : भारतीय सनातन संस्कृति की दिव्य महिमा का चित्रमय दर्शन करानेवाली भव्य प्रदर्शनी विभिन्न साधु-संतों के सत्संग- कार्यक्रमों तथा मेले-पर्व इत्यादि धार्मिक आयोजनों के स्थलों पर लगायी जाती है, जिससे लोगों को धार्मिक जीवन जीने की युक्ति सहज ही प्राप्त हो सके ।

ख) सत्संग-आयोजन व राष्ट्र-जागृति : समय-समय पर साधु-संतों एवं राष्ट्रप्रेमियों का सत्संग आयोजित कर भारतीय संस्कृति की दिव्यता को उजागर किया जाता है, जिससे समाज में धार्मिक, सामाजिक व नैतिक जीवन-मूल्यों का भलीप्रकार सिंचन हो तथा उन्हें सुस्थिर किया जा सके ।

ग) गौ-सेवा एवं गौ-संवर्धन : गाय को माता क्यों कहा गया, इसके संरक्षण-संवर्धन के उपाय, इससे होनेवाले लाभ तथा कृषि व मानव-जीवन में गौ की उपयोगिता, महत्ता का प्रचार-प्रसार किया जाता है । गौ-उत्पाद जैसे – गौझरण अर्क, फिनायल, कीटनाशक, केंचुआ खाद इत्यादि बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है ।

(घ) वृक्षारोपण/पर्यावरण सुरक्षा अभियान : बारिश के दिनों में तुलसी, आँवला, पीपल, नीम, वटवृक्ष, आम इत्यादि के पौधे पूरे गाँव/शहर के धार्मिक एवं सार्वजनिक खाली स्थलों पर लगाये जाते हैं तथा उनकी सुरक्षा व देखरेख पर विशेष ध्यान दिया जाता है ।
वृक्षारोपण के लिए दूसरे गाँव-शहर के लोगों को भी प्रोत्साहित किया जाता है व इस कार्य में उनकी मदद की जाती है । ‘आस्था केन्द्र’ पर पहले से ही पर्याप्त मात्रा में तुलसी, आँवला, पीपल, वटवृक्ष इत्यादि की कलम या पौधे तैयार कर लिये जाते हैं ।

5) सहायता-सेवा केन्द्र

जरूरतमंद व्यक्तियों की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक व धार्मिक किसी भी तरह की समस्याओं के निराकरण के लिए ‘सहायता-सेवा केन्द्र’ पूरी तरह प्रयास करता है । इसका लाभ लेने के लिए लाभार्थी ‘संस्कृति रक्षक संघ’ के द्वारा नियुक्त इस केन्द्र के सदस्यों के सामने खुलकर अपनी समस्याओं को रखें । इसके अलावा भी ‘सहायता-सेवा केन्द्र’ द्वारा सामूहिक सेवाएँ चलायी जाती हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं :

(क) सामूहिक सेवा-योजना : इसके अंतर्गत इकट्ठे होकर सामूहिक रूप से किसी-न-किसी सार्वजनिक सर्वोपयोगी कार्य को किया जाता है । जैसे – मेले, पर्व, सत्संग-कार्यक्रम इत्यादि में सेवा देना, जरूरतमंद व्यक्तियों की सहायता करना, अस्पतालों में सेवा करना, बाढ़ राहत कार्य, भूकम्प-पीड़ितों की सहायता आदि प्राकृतिक आपदाओं में सेवाकार्य ।

(ख) सामूहिक विवाह-योजना : वैदिक परम्पराओं के अनुसार समय-समय पर सामूहिक विवाह का आयोजन किया जाता है । जिससे विवाह- परम्परा की शुद्ध वैदिक रीति का प्रचार हो तथा लुप्त हो रहीं वैदिक परम्पराओं को बचाया जा सके ।

(ग) सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना : सरकार द्वारा चलायी जा रहीं जनोपयोगी योजनाओं का ‘संस्कृति रक्षक संघ-एन.जी.ओ.’ के माध्यम से समाज को लाभ दिलाया जाता है ।

(घ) गरीब सेवा-सहायता कार्यक्रम : विशेष अवसरों पर आदिवासियों, गरीब लोगों में भण्डारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें भोजन के साथ अनाज, बर्तन, कपड़े इत्यादि उपयोगी वस्तुएँ तथा आर्थिक मदद भी दी जाती है तथा गरीबी दूर करने के उपाय भी बताये व किये जाते हैं ।