Vichar gosthi 26 March 2017



भारतीय विधि एवं न्याय परम्परा से जुड़ा संविधान बने
संस्कृति रक्षक संघ की विचार गोष्ठी में विद्वानों का आग्रह
विगत 26 मार्च, 2017 को मन्दिर मार्ग स्थित हिन्दू महासभा के भवन में संस्कृति रक्षक संघ द्वारा एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें विद्वानों का सर्वसम्मति से यह आग्रह रहा कि भारत का संविधान भारतीय विधि और न्याय परम्परा के अनुरूप होना चाहिए, जब तक नये संविधान की रचना सम्पन्न नहीं हो जाती, तब तक वर्तमान संविधान में ही आवश्यक संशोधन कर इसे भारतीय समाज और संस्कृति तथा न्याय-परम्परा से संयुक्त करना चाहिए।
वैदिक स्तुतियों और गणेश वन्दना तथा भगवान राम की स्तुति के उपरान्त प्रारम्भिक सत्र में संस्कृति रक्षक संघ के राष्ट्रीय संयोजक श्री राजेश शर्मा ने वर्तमान संविधान के द्वारा भारत का शासन संचालित होने को संवैधानिक गुलामी बताया और भारत में न्यायिक विफलता के लिए इसे जिम्मेदार बताया। उनका कहना था कि इण्डिया इंडिपेंडेंस एक्ट, 1947 और ट्रांसफर ऑफ पावर की प्रक्रिया के द्वारा भारत में इण्डिया एक्ट, 1935 को ही थोड़े संशोधनों के साथ लागू कर दिया गया है और अंग्रेज़ों के बनाये दीवानी और फौजदारी कानून जारी रखे गये हैं, जो भारतीय जन को असहाय और विवश बनाते हैं। इन्हीं प्रावधानों का उपयोग कर बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन यूरोपीय राष्ट्रों और ईसाई संस्कृति के पक्ष में भारत का रूपान्तरण करने के लिए कार्यरत हैं। इसीलिए वर्तमान विधि-व्यवस्था में भारत की अपनी न्याय परम्पराएँ, खाप आदि परम्परागत पंचायतें और भारत के धर्माचार्य सर्वाधिक उपेक्षित हैं और उनके विरुद्ध अभियान चलाये जा रहे हैं। एक सिने अभिनेता को हत्या के आरोप के बाद भी आसानी से जमानत मिल जाती है और एक महान धर्माचार्य को विरोधी द्वारा भडक़ायी गयी या प्रलोभन से उकसायी गयी किसी बालिका के अपुष्ट आरोपों की आड़ लेकर तीन वर्षों से उन्हें लगातार जेल में रखा जा रहा है और जमानत नहीं दी जा रही है। ये विसंगतियाँ अपने आपमें सब कुछ बता देती हैं। श्री शर्मा ने यह भी बताया कि 30 सितम्बर 2016 तक न्यालयों में लंबित मामलों की लम्बी लिस्ट है 2,85,12,853 निचली अदालतों में 40,11,965 हाइकोर्ट में तथा 60,938 मामलें सर्वोच्च न्यायालय में पेंडिंग हैं ।
सनातन संस्था के राष्ट्रीय मार्गदर्शक पूज्य डॉ. चारुदत्त पिंगले ने कहा कि धर्म के अभाव में सदाचार और सुशासन असम्भव है। इस्लाम और ईसाइयत के भारतीय अनुयायी अपने-अपने मज़हबों के अनुसार कार्य कर रहे हैं, परन्तु हिन्दुओं के सनातन धर्म को राज्य द्वारा सब प्रकार से उपेक्षित और दमित किया जा रहा है। सनातन धर्म की शिक्षा हिन्दू बालकों-बालिकाओं को भी देने की अनुमति शासन द्वारा वित्त पोषित शिक्षा संस्थाओं में नहीं है, जबकि अल्पसंख्यकों को बहुजनों के टैक्स से मुख्यत: संचित राजकोष से भारी अनुदान देकर अपने-अपने मज़हब की शिक्षा देने को प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह भारतीय नागरिकों के साथ भारत के राज्य द्वारा खुला भेदभाव है। यह अधर्म की स्थिति है। अधर्म को विदा करके धर्म की स्थापना, साधना और अनुशीलन करने पर ही एक तेजस्वी राष्ट्र का निर्माण सम्भव है।
गाँधी विद्या संस्थान, वाराणसी के निदेशक प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा कि राजनीति पूर्णत: यथार्थ पर आधारित वस्तु है और हमें दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ ही तात्कालिक उपायों पर भी व्यवहार में अमल करना होगा । संविधान के भाग-4, अनुच्छे-48 में यह जोड़ा जाना चाहिए कि भारत राज्य भारतीय नागरिकों की आध्यात्मिक उन्नति और आध्यात्मिक न्याय के लिए भी कार्य करेगा। इसी प्रकार किसी उपयुक्त धारा में यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि भारत का शासन बहुसंख्यकों के धर्म को भी वैसा ही संरक्षण देगा, जैसा वह अल्पसंख्यक के मज़हब और रिलीजन को देता है। उन्होंने कहा कि भारत के माननीय सांसदों को आपातकाल में 1976 ईस्वी में प्रस्तावना में ही जोड़े गये दो शब्दों- समाजवाद और सेकुलरिज़्म को परिभाषित कर देना चाहिए, जिससे अभी इन शब्दों को लेकर जो मनमानी की जा रही और अनर्थ किया जा रहा है, उस पर विराम लगेगा।
गोष्ठी में यह भी माँग की गयी कि भारत की संसद भारत राज्य को परिभाषित करे । भारत का राज्य भारतीय समाज की एक सर्वप्रमुख और प्रतिनिधि संस्था है, जो भारतीय नागरिकों की राजनैतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है- यह बात परिभाषा के द्वारा स्पष्ट की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि यूरोप के प्रत्येक राष्ट्र में ईसाइयत के किसी न किसी पंथ को अधिकृत रूप से राजकीय वैधानिक संरक्षण प्राप्त है, अर्थात् हर एक का एक राष्ट्रीय चर्च घोषित है। यदि भारत इंग्लैण्ड की नकल भी करे, तो अपने आप सनातन धर्म भारत का राष्ट्रीय धर्म होगा। संविधान के रचनाकार यह मानकर चल रहे थे, इसीलिए उन्होंने साथ ही अल्पसंख्यकों को संरक्षण दिया। यदि बहुसंख्यकों को, हिन्दू धर्म को पूर्ण राजकीय शक्ति प्राप्त नहीं है तो अल्पसंख्यकों को विशेष संरक्षण का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता।
एक ओर तो भारतीय संविधान नागरिकों की नागरिक पहचान पर बल देता है, परन्तु दूसरी ओर वह अल्पसंख्यक नागरिकों की मज़हबी पहचान पर बल देता है। इस प्रकार व्यवहार में नागरिकों के ये दो स्पष्ट भेद हैं। इसी तरह अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग में जातियों का स्पष्ट उल्लेख है और इस प्रकार जाति भारत की एक संवैधानिक रूप से स्वीकृत संस्था है, जबकि भारत के सभी राजनैतिक दल जाति-व्यवस्था की निन्दा करते हुए जाति-नाश की बात करते रहते हैं। यदि जाति का नाश होना है तो उसे कोई भी संवैधानिक मान्यता नहीं देनी चाहिए और नहीं दी जा सकती। इस तरह इन मुद्दों पर जो अस्पष्टता है, वह संसद दूर करे । न्यायपालिका राज्य का ही एक अंग है, वह राज्य से स्वतंत्र कोई वस्तु नहीं है, उसे कोर्ट कहा जाता है, क्योंकि वह राज्य का ही आँगन है। अत: अंग्रेज़ी शब्दों के गलत हिन्दी अनुवाद के द्वारा भ्रमित नहीं होना चाहिए।
हिन्दू महासभा के अध्यक्ष श्री चन्द्रप्रकाश कौशिक ने संगोष्ठी के आयोजक के उद्देश्यों की प्रशंसा की और उनसे अपनी पूर्ण जतायी। संस्कृत भारत अभियान के संयोजक श्री चन्द्रप्रकाश ने कहा कि भारत की राष्ट्रभाषा संस्कृत होनी चाहिए। हिन्दुत्व ही भारत की आत्मा है और हम ही यहाँ के स्वदेशी समाज हैं। राममन्दिर स्वदेशी समाज का सांस्कृतिक केन्द्र है और दुनिया की कोई भी ताकत हमें राममन्दिर बनाने से नहीं रोक सकती, वस्तुत: हमारे राज्यकर्ताओं ने ही हमें रोक रखा है।
सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्तागण श्री शिवनारायण पाण्डेय, सुश्री हरजीत कौर और श्री अंजनीकुमार मिश्र ने संविधान की अनेक विसंगतियों को स्पष्ट किया। उनका कहना था कि वर्तमान संविधान को बदलने की ज़रूरत है, क्योंकि इसमें ऐसे कई प्रावधान हैं जो अत्याचार का साधन बन जाते हैं। विशेषकर न्याय की जो प्रक्रिया है, उसमें देर होने और उलझाने की इतनी गुंजाइश रखी गयी है कि जिससे हत्यारे और अवैध कब्जा करने वाले गुण्डे वर्षों तक आनन्द करते हैं और पीडि़त व्यक्ति उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इन अधिवक्ताओं का यह भी कहना था कि वस्तुत: भारत में कुल दो ही समाज हैं- पहला हिन्दू समाज और दूसरा कन्वर्टेड हिन्दू। भारत में ऐसा एक भी ईसाई या मुसलमान नहीं है, जिसके पूर्वज हिन्दू नहीं थे।
श्रोताओं के प्रश्र के उत्तर में श्री अंजनीकुमार मिश्र ने बताया कि कोई कानून केवल तभी बदला जायेगा जब सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में यह बताया जायेगा कि वह कानून किस प्रकार संविधान की किस धारा का या प्रावधान का उल्लंघन करता है और न्यायालय इस बात से सन्तुष्ट होगा तथा उस कानून को संविधान की मूल भावना के विरुद्ध मानेगा, अन्यथा न्यायिक प्रक्रिया से किसी भी कानून को बदला जाना सम्भव नहीं है। कानून बदलने का काम विधायिका का है और उसे लागू करने का काम कार्यपालिका का है। अनुच्छेद-30 अल्पसंख्यकों को अपने मज़हब के अनुसार शिक्षा देने का अधिकार देता है, जो अनुच्छेद 25 के उस प्रावधान से हटकर है जिसमें सभी को अपने-अपने धर्म और मज़हब के पालन का अधिकार प्राप्त है। क्योंकि व्यवहार में अनुच्छेद-30, अनुच्छेद-25 को बाधित करता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापक श्रीमती एनी ने कहा कि हमारा संविधान एक ओर नागरिकों की राजनैतिक पहचान को आधार बनाता है और दूसरी ओर वह कुछ नागरिकों की मज़हबी पहचान को आधार बनाता है, यह बहुत बड़ा विरोधाभास है। कु. मोनिका ने पूज्य संत आशाराम बापू के साथ हो रहे अत्याचारों के लिए सरकार को दोषी बताया तथा इस भयंकर अन्याय को धामिर्क दमन का एक दृष्टान्त बताया और इसे दूर करने की आवश्यकता बतायी ।
सांस्कृतिक गौरव संस्थान के श्री महेशचन्द्र गुप्त ने जनसंख्या विस्फोट को विशेषकर एक मज़हब के अनुयायियों की जनसंख्या के विस्तार को भारत के लिए बड़ा खतरा बताया। युवा सेवा संघ के श्री सोमेष तनेजा ने शिक्षा को भारतीय संस्कार और ज्ञान परम्परा से जोडऩे की आवश्यकता बतायी । जींद से आये स्वामी शिवानन्द ने तप और त्याग पर बल दिया। विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री विनोद बंसल ने कहा कि स्वयं गाँधी जी ने कहा था कि स्वाधीन भारत में पहला कानून गौरक्षा के लिए बनेगा, परन्तु वह आज तक नहीं बना । उन्होंने कहा कि मदरसे जेहाद के प्रशिक्षण की कार्यशाला बन गये हैं । संस्कृति गौरव संस्थान के श्री विनोद कुमार ने कहा कि संविधान का आधार सदा किसी राष्ट्र के बहुसंख्यक ही हुआ करते हैं । उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी मज़हबी किताब में दूसरे मज़हब वालों के कत्ल और उत्पीडऩ की प्रेरणा दी गयी है तो ऐसी किताब के रहते राष्ट्र में शान्ति नहीं हो सकती ।
योग वेदान्त सेवा समिति के श्री दुर्गेश पाण्डेय ने न्याय व्यवस्था के मामले में किये जा रहे पक्षपात का उदाहरण देते हुए एक सिने अभिनेता और पूज्य संत श्री आशाराम बापू के साथ जमानत के मामले में किये जा रहे घनघोर भेदभाव का उदाहरण दिया । राष्ट्रवादी शिवसेना के राष्ट्रीय अध्यश्क्ष श्री जयभगवान गोयल, संस्कृति रक्षक संघ के राष्ट्रीय सचिव श्री महेन्द्र साहू, रफ्तार न्यूज चैनल के मुख्य पत्रकार श्री शिवनारायण जागजा, राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार श्री भदौरिया, गीता के अन्तर्राष्ट्रीय प्रवचनकार श्री कृष्णकान्त द्विवेदी तथा फाउण्डेशन फॉर हिन्दू पॉलिटी के श्री सुरजीत पाल आदि ने भी संगोष्ठी में विचार व्यक्त किये।
- भरत कुमार शर्मा,
बी-12, आकृति गार्डन, भोपाल