गौरक्षा : में ही जीवन



वर्ष 2015 में विश्व में गोमांस का कुल उत्पादन 5 करोड़ 84 लाख 43 हजार मीट्रिक टन हुआ और विश्व में पाँचवें स्थान पर भारत में 42 लाख मीट्रिकटन उत्पादन हुआ । 1951 में 1000 की जनसंख्या पर 430 पशु थे वे आज मात्र 50 रह गये हैं। आजादी के पहले भारत में 300 कत्लखाने थे और आज 36,000 से अधिक सार्वजनिक तथा 30,000 अवैध कत्लखाने चल रहे हैं। देवनार (मुम्बई) कत्लखाना एशिया का सबसे बड़ा कसाईघर है। कत्लखानों में हर साल 27,46,000 मवेशी मौत के घाट उतार दिये जाते हैं।

कटती गायों की चीत्कार से पृथ्वी का रक्षाकवच ओजोन परत में 2 करोड़ 70 लाख वर्ग किलोमीटर का छिद्र हो गया है, जिससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। भूकम्प, सुनामी प्राकृतिक आपदों आदि का कारण कटती गायों की चीत्कार है । यदि गोहत्या इसी तरह चलती रही तो 2020 तक प्रलय आना है । सम्भव । भारतवासियो ! शीघ्र गौहत्या रोकें।

संतों-महापुरुषों की आवाज

''इस देश में गोहत्या नहीं चल सकती। गोहत्या जारी रही तो देश में बगावत होगी।'' - संत विनोबा भावे

''भारतीय संविधान में पहली धारा सम्पूर्ण हत्या निषेध होनी चाहिये'' - पं. मदन मोहन मालवीयजी

''गाय की सेवा पुण्यात्मा बनाती है, अकाल मृत्यु टालती है ।'' - संत श्री आसारामजी बापू

''यदि संसार में हिन्दू कहलाकर जीवित रहना चाहते हैं तो सर्वप्रथम प्राणपण से हमें गौरक्षा करनी होगी'' - प्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी महाराज

''सरकार की गोहत्या-नीति का कड़ा विरोध करना चाहिए और वोट उनको ही देना चाहिए जो देश में पूर्ण रूप से गोहत्या बंद करने का वचन दें।'' - स्वामी श्री रामसुखदासजी

जागो भारतवासी जागो...!

ब्रिटेन की 'यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स' के टिम बेंटन के अनुसार ''कार्बन फुटप्रिंट (कार्बनडाइऑक्साइड या ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन) घटाने के लिए लोग सबसे बड़ा जो योगदान कर सकते हैं, वह कारें छोड़ना नहीं है बल्कि लाल मांस खाना कम करना है।''
गोवध पर्यावरण के लिए कितना घातक है यह बात आज कई वैज्ञानिक शोधों से सामने आ चुकी है। 'यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंट प्रोग्राम' ने गोमांस को पर्यावरणीय रूप से हानिकारक मांस बताते हुए कहा कि 'ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के मामले में एक किलो गोमांस-सेवन लगभग 160 कि.मी. तक किसी मोटरवाहन का इस्तेमाल करने के बराबर है।'

भारत में श्वेत क्रांति लाने के बहाने विदेशी नस्ल की गायों को बढ़ावा देकर देशी नस्ल को खत्म करने का विदेशी कुचक्र रचा गया, जिसके जाल में देश बुरी तरह फँस गया है।

डॉ. उत्तम माहेश्वरी ने जर्सी गाय को रोगों का घर कहा और इसकी तुलना विशालकाय सुअर से की वैज्ञानिक डॉ. कीथ वुडफोर्ड ने अपनी पुस्तक 'द डेविल इन द मिल्क' में लिखा है कि 'विदेशी गायों का दूध मानव-शरीर में बीटा केसोमॉर्फीन-7 नामक विषाक्त तत्त्व छोड़ता है। इसके कारण मधुमेह, धमनियों में खून जमना, दिल का दौरा, ऑटिज्म और स्किजोफे्रनिया (एक प्रकार का मानसिक रोग) जैसी घातक बीमारियाँ होती हैं।'

चिकित्सकों के अनुसार जर्सी या फ्रिजीयन गायों के शरीर, खुरों तथा मूत्र व गोबर से विषैले कीटाणु विकसित होकर फैलते हैं, जिससे आसपास का पर्यावरण विषाक्त हो जाता है। उसमें साँस लेनेवालों के फेफड़ों में वे विषाणु प्रवेश करके नयी-नयी बीमारियाँ पैदा करते हैं, जिससे हजारों लोगों की मौत हो चुकी है।

गोसेवाव्रत से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च ।
गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम् ।।
(महा.अनु. 80।3)

कर्यो श्याम जिनि नेह, लोक मातु अति बिमल शुचि ।
जिनि तनु सब सुरगेह, तिनि सुरभिनि बन्दन करूँ ।।
गैयनिमें अति प्रीति, गैयनिमें ईं नित बसूँ ।
गाऊँ गैयनि गीति, गैयनिकूँ सरबसु गनूँ ।।

उपनिषद् की एक कथा है । सत्यकाम नामक एक बालक था । घर में उसकी अकेली माता ही थी । जब उसकी अवस्था बारह वर्ष की हो गयी, तब उसने जाकर अपनी जननी से कहा - 'माँ ! अब मैं बारह वर्ष का हो गया हूँ, अब मुझे गुरु के समीप गुरुकुल में वास करके वेदाध्ययन करना चाहिये ।'

माँ ने कहा - 'अच्छा, बेटा ! जाओ । तुम्हारा मंगल हो ।'

सत्यकाम ने कहा - 'किंतु माँ ! गुरु मुझसे मेरा गोत्र पूछेंगे तो मैं क्या बताऊँगा । मुझे अपने गोत्र का तो ज्ञान ही नहीं, मुझे मेरा गोत्र बता दो ।'

माता ने कहा - 'बेटा ! गोत्र का तो मुझे भी पता नहीं, मैं सेवा में सदा तत्पर रहती थी । युवावस्था में तू पैदा हुआ, संकोचवश मैं तेरे पिता से गोत्र न पूछ सकी ।'

माँ की बात सुनकर सत्यकाम हारिद्रुमत ऋषि के समीप वेदाध्ययन के उद्देश्य से गया । उन्हें प्रणाम करके वह विनम्रतापूर्वक उनकी आज्ञा से बैठ गया ।

गुरु ने पूछा - 'बालक ! तुम क्या चाहते हो ?'

सत्यकाम ने कहा - 'भगवन् ! मैं आपके चरणों में रहकर वेदाध्ययन करना चाहता हूँ ।'

गुरु ने पूछा - 'तुम्हारा गोत्र क्या है ?'

सत्यकाम बोला - 'भगवन् ! मैंने अपनी माँ से अपने गोत्र के संबंध में पूछा था । उन्होंने कहा - 'मैं सदा-सर्वदा आगत अतिथि-अभ्यागतों की सेवा में संलग्न रहती थी । युवावस्था में तू उत्पन्न हुआ, मैं कह नहीं सकती कि तेरे पिता का कौन गोत्र है । मैं इतना ही जानती हूँ, तेरा नाम सत्यकाम और तू मुझ जाबाला का पुत्र है ।'

यह सुनकर महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले - 'बेटा ! निश्चय ही तू ब्राह्मण है; क्योंकि ब्राह्मण के अतिरिक्त इतनी सत्य बात कोई कह नहीं सकता, तू समिधा ले आ मैं तेरा उपनयन करूँगा । तू आज से सत्यकाम जाबाल के नाम से प्रसिद्ध होगा ।'
गुरु ने शिष्य का उपनयन किया । उन दिनों रुपये-पैसे को बड़ा धन नहीं माना जाता था । उन दिनों गौ को ही धन माना जाता था, जिसके यहाँ जितना ही अधिक गोधन होता वह उतना ही बड़ा-श्रेष्ठ माना जाता ।

दान, धर्म, पारितोषिक, शास्त्रार्थ, यज्ञ और सभी देव, पितृ तथा ऋषि-ऋणों में गौ ही दी जाती थी । उपनिषदों में ऐसी अनेक कथाएँ हैं, अमुक राजा ने मुनियों से कोई प्रश्न पूछा और उसमें यही पारितोषिक रखा कि जो इस प्रश्न का उत्तर दे वह इतनी लाख गौएँ पाये । अमुक ऋषि आये उन्होंने अपने शिष्यों से कहा - 'इन गौओं को हाँक ले चलो ।' सारांश यही कि सभी राजाओं, ऋषियों तथा कृषकों के पास सहस्रों, लक्षों गौएँ रहती थीं ।

ऋषियों के समीप जो शिष्य शिक्षा प्राप्त करने आते थे, उन्हें सर्वप्रथम यही शिक्षा दी जाती थी कि वे गोसेवा का व्रत लें । गौओं की सेवा-शुश्रूषा से स्वतः ही उन्हें सर्वशास्त्र आ जाते थे ।

महर्षि हारिद्रुमत के यहाँ भी सहस्रों गौएँ थीं । सत्यकाम जाबाल का जब उपनयन-संस्कार हो गया, तब वे उसे लेकर अपने गौओं के गोष्ठ में गये । सहस्रों सुन्दर दुधार गौओं में से मुनि ने चार सौ दुबली-पतली गौएँ छाँटीं और सत्यकाम से बोले - बेटा ! तू इन गौओं के पीछे-पीछे जा और इन्हें चराकर पुष्ट कर ला ।

बारह वर्ष का सत्यकाम गुरु के भाव को समझकर बोला - 'भगवन् ! मैं इन गौओं को लेकर जाता हूँ और जब तक ये एक सहस्र न हो जायँगी, तब तक मैं लौटकर न आऊँगा ।'

गुरु ने कहा - 'तथास्तु ।'

सत्यकाम उन गौओं को लेकर ऐसे वन में गया जहाँ हरी-हरी दूब थी, जल का सुपास था और जंगली जीवों का कोई भय न था । वह गौओं के ही बीच में रहता, उनकी सेवा-शुश्रूषा करता, वन के सभी क्लेशों को सहता, गौ के दुग्ध पर ही रहता, उसने अपने जीवन को गौओं के जीवन में तदाकार कर दिया । वह गोसेवा में ऐसा तल्लीन हो गया कि उसे पता ही न चला कि गौएँ कितनी हो गयी हैं।

तब वायुदेव ने वृषभरूप रखकर सत्यकाम से कहा - 'ब्रह्मचारिन् ! हम अब सहस्र हो गये हैं । तुम हमें आचार्य के घर ले चलो और तुम्हें मैं एकपाद ब्रह्म का उपदेश करूँगा ।'

यह कहकर धर्मरूपी वृषभ ने सत्यकाम को एकपाद ब्रह्म का उपदेश दिया । गुरु के गृह से वन दूर था । चार दिन का मार्ग था । इसलिये मार्ग में जहाँ वह ठहरा, वहीं उसे ब्रह्मज्ञान का उपदेश मिला । इस प्रकार पहला पाद वृषभ ने, दूसरा पाद अग्नि ने, तीसरा पाद हंस ने और चौथे पाद का उपदेश मद्गु नामक जलचर पक्षी ने किया । गौओं की निष्काम सेवा-शुश्रूषा से वह परम तेजस्वी ब्रह्मज्ञानी हो गया था ।

उसने एक सहस्र गौओं को ले जाकर गुरु के सम्मुख प्रस्तुत किया और उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया । गुरु ने उसके मुख को ब्राह्मीश्री से देदीप्यमान देखकर अत्यन्त ही प्रसन्नता से कहा - 'बेटा सत्यकाम ! तेरे मुखमण्डल को देखकर तो मुझे ऐसा लगता है तुझे ब्रह्मज्ञान हो गया है, तू सत्य-सत्य बता तुझे ब्रह्मज्ञान का उपदेश किसने किया ?'

सत्यकाम ने अत्यन्त विनीतभाव से कहा - 'गुरुदेव ! आपकी कृपा से सब कुछ हो सकता है । आप मुझे उपदेश करेंगे तभी मैं पूर्ण समझूँगा ।'

वही ज्ञान गुरु ने दुहरा दिया । सत्यकाम पूर्ण ब्रह्मज्ञानी हो गये ।

गोपद्म-व्रत
आषाढ़ शुक्ल एकादशी को प्रातः स्नानादि के पश्चात् गौ के निवासस्थान को गोबर से लीपकर उसमें तैंतीस पद्म (कमल) स्थापन करके उनका गन्ध-पुष्पादि से पूजन करे और तैंतीस अपूप (पूए) भोग लगाकर उतने ही अर्घ्य, प्रदक्षिणा और प्रणाम अर्पण कर व्रत करे । इस प्रकार कार्तिक शुक्ल एकादशीपर्यन्त प्रतिदिन करने के पश्चात् द्वादशी को पहले वर्ष में पूए, दूसरे में खीर और पूए, तीसरे में मण्डक, चौथे में गुड़ और मण्डक तथा पाँचवें में घृतपाचित (घी में पकाये हुए) मण्डकों से पारण करके उद्यापन करे तो जीवनपर्यन्त सुख-सम्पत्ति से युक्त रहता है और परलोक में स्वर्गीय सुख प्राप्त होते हैं । इस व्रत के आचरण से इस लोक में राज्य, सौभाग्य, सम्पत्ति तथा पुत्र-पौत्रादिक सुख भोगकर मनुष्य अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है । (भविष्योत्तरपुराण)